शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती व्यवसायिक मानसिकता: क्या विद्यार्थी और अभिभावक ठगे जा रहे हैं?

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

बनारस केसरी, दुद्धी : शिक्षा को समाज का आधार स्तंभ माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में यह एक व्यवसायिक उद्योग बनता जा रहा है। कतिपय विद्यालय और शिक्षण संस्थान अब शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की मानसिकता से भी प्रेरित दिखाई दे रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप विद्यार्थियों और अभिभावकों को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

आजकल कई निजी स्कूल और कोचिंग संस्थान नए विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े दावे करते हैं। एडमिशन के समय उन्हें सर्वश्रेष्ठ शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं, अनुभवी शिक्षक और 100% सफलता की गारंटी जैसे झूठे प्रलोभन दिए जाते हैं। लेकिन वास्तविकता अक्सर इन दावों से बिल्कुल अलग होती है। एक अभिभावक, श्रीमती सीमा वर्मा, बताती हैं,
“स्कूल में प्रवेश के समय हमें यह बताया गया था कि हमारे बच्चे को स्मार्ट क्लास, खेल सुविधाएं और विशेष शिक्षण तकनीकें मिलेंगी, लेकिन कुछ महीनों में ही पता चला कि यह सब सिर्फ विज्ञापन तक सीमित था।”

कुछ विद्यालय और शिक्षण संस्थान परीक्षा के दौरान अलग-अलग बहानों से अघोषित शुल्क वसूलते हैं। चाहे वह प्रोजेक्ट वर्क के नाम पर हो या फिर परीक्षा शुल्क के रूप में, अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया जाता है। एक अभिभावक, श्री रोहित मिश्रा, का कहना है,
“बच्चों की परीक्षा से ठीक पहले स्कूल ने ऐच्छिक गतिविधियों के नाम पर 3000 रुपये की मांग कर दी। जब हमने विरोध किया, तो कहा गया कि यह अनिवार्य है, अन्यथा बच्चे को परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा।”

सबसे गंभीर समस्या बोर्ड परीक्षा में नामांकन के दौरान उत्पन्न होती है। कई स्कूल इस प्रक्रिया के नाम पर अभिभावकों से बड़ी राशि वसूलते हैं। शुल्क इतना अधिक होता है कि मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इसे वहन करना कठिन हो जाता है। एक छात्र के पिता, श्री अरविंद तिवारी, ने रेणुकूट के एक सीबीएसई विद्यालय का नाम लेते हुए बताया कि “बच्चे का बोर्ड नामांकन करते समय स्कूल ने 7500.00 रुपये की मांग की, जबकि आधिकारिक शुल्क मात्र 300 रुपये था। जब हमने कारण पूछा, तो जवाब मिला कि यह प्रशासनिक खर्च है!”

शिक्षा का व्यवसायीकरण अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए चिंता का विषय बन गया है। सरकारी एजेंसियों को इस पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और शिक्षा नीति को पारदर्शी बनाना चाहिए। वहीं, अभिभावकों को भी सतर्क रहने की जरूरत है, ताकि वे किसी भी प्रकार की आर्थिक ठगी का शिकार न बनें। शिक्षा एक अधिकार है, न कि व्यापार!

Banaras Kesari
Author: Banaras Kesari

Leave a Comment

और पढ़ें